अध्यापक पात्रता परीक्षा जब-तब विवादों के घेरे में ही रही है। हाईकोर्ट ने
पिछले वर्ष चयनित 9000 जेबीटी अध्यापकों के पात्रता प्रमाणपत्रों की जांच
का आदेश दिया है क्योंकि इस बारे में कोर्ट को सौंपी गई आरंभिक जांच
रिपोर्ट में उच्च स्तर पर फर्जीवाड़े की आशंका जताई गई है। संदेह है कि
मुन्नाभाई स्टाइल का सहारा लेकर पात्रता परीक्षा पास की गई। जेबीटी में
भर्ती के समय उस महत्वपूर्ण नियम का पालन नहीं किया गया जो शिक्षा बोर्ड की
विवरणिका में उल्लिखित था। पात्रता परीक्षा के समय विवरणिका में साफ-साफ
लिखा था कि परीक्षा की उत्तर पुस्तिका पर अंगूठे के निशान और फार्म पर
लगाए गए अंगूठे के निशान को मिला कर ही प्रमाणपत्र जारी किए जाएं। ऐसा न
होने का आरोप लगाते हुए मामला कोर्ट में लाया गया तभी जांच कराने का
आदेश दिया गया था। कभी-कभी लगता है कि हरियाणा में शिक्षा अभियान की गति बेतरतीब है। उपकरणों, फर्नीचर व अन्य वस्तुओं की खरीद की गति बेलगाम नजर आती है तो शिक्षा सुधार के मामले में महकमा हांफता दिखाई देता है। जेबीटी अध्यापकों की इतनी बड़ी संख्या में भर्ती भी आनन-फानन में की गई। सरकार का यह संकल्प प्रशंसनीय है कि शिक्षा विभाग के हर रिक्त पद को जल्द भरा जाएगा ताकि शिक्षक-छात्र अनुपात सही रहे और शिक्षण कार्य में कोई कमी न रह जाए लेकिन भर्ती प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना भी तो उतना ही जरूरी है। इस ओर कोई संकल्प क्यों नहीं दिखाया जा रहा? नए प्रयोग के तौर पर स्कूल प्रबंध समितियों का गठन हुआ था पर क्या वे वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति करने में सक्षम साबित हो रही हैं? सभी को शिक्षा के अधिकार कानून पर कितना अमल हुआ, निजी स्कूलों में नियम 134 ए पर अमल सुनिश्चित करने के लिए कितना तत्पर दिखा विभाग, उपकरणों के रखरखाव पर कितना ध्यान दिया गया? ऐसे कई और सवालों पर विभाग को कभी भी घेरा जा सकता है पर यहां तो प्रश्न अध्यापक पात्रता परीक्षा की प्रामाणिकता का है। सबसे अहम सवाल यह है कि यदि कुछ मुन्नाभाइयों की करतूतों के कारण पूरी प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहरा दिया गया तो हजारों जेबीटी अध्यापकों के भविष्य का क्या होगा? सरकार के पास क्या विकल्प बचेगा? विभाग की साख कितनी बच पाती है, यह तो प्रमाणपत्रों की अंतिम जांच रिपोर्ट पर निर्भर करेगा परंतु सरकार को तमाम कमजोर कडि़यों की पहचान करके उनका निदान सुनिश्चित करना होगा ताकि बार-बार असहज स्थिति का सामना न करना पड़े।
आदेश दिया गया था। कभी-कभी लगता है कि हरियाणा में शिक्षा अभियान की गति बेतरतीब है। उपकरणों, फर्नीचर व अन्य वस्तुओं की खरीद की गति बेलगाम नजर आती है तो शिक्षा सुधार के मामले में महकमा हांफता दिखाई देता है। जेबीटी अध्यापकों की इतनी बड़ी संख्या में भर्ती भी आनन-फानन में की गई। सरकार का यह संकल्प प्रशंसनीय है कि शिक्षा विभाग के हर रिक्त पद को जल्द भरा जाएगा ताकि शिक्षक-छात्र अनुपात सही रहे और शिक्षण कार्य में कोई कमी न रह जाए लेकिन भर्ती प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना भी तो उतना ही जरूरी है। इस ओर कोई संकल्प क्यों नहीं दिखाया जा रहा? नए प्रयोग के तौर पर स्कूल प्रबंध समितियों का गठन हुआ था पर क्या वे वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति करने में सक्षम साबित हो रही हैं? सभी को शिक्षा के अधिकार कानून पर कितना अमल हुआ, निजी स्कूलों में नियम 134 ए पर अमल सुनिश्चित करने के लिए कितना तत्पर दिखा विभाग, उपकरणों के रखरखाव पर कितना ध्यान दिया गया? ऐसे कई और सवालों पर विभाग को कभी भी घेरा जा सकता है पर यहां तो प्रश्न अध्यापक पात्रता परीक्षा की प्रामाणिकता का है। सबसे अहम सवाल यह है कि यदि कुछ मुन्नाभाइयों की करतूतों के कारण पूरी प्रक्रिया को दोषपूर्ण ठहरा दिया गया तो हजारों जेबीटी अध्यापकों के भविष्य का क्या होगा? सरकार के पास क्या विकल्प बचेगा? विभाग की साख कितनी बच पाती है, यह तो प्रमाणपत्रों की अंतिम जांच रिपोर्ट पर निर्भर करेगा परंतु सरकार को तमाम कमजोर कडि़यों की पहचान करके उनका निदान सुनिश्चित करना होगा ताकि बार-बार असहज स्थिति का सामना न करना पड़े।


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ANIL KUMAR
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