मिड डे मील योजना जिस प्रयोजन से शुरू की गई थी, हरियाणा में कुछ हद तक
उसके परिणाम दिखाई देने लगे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों
का रुझान सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ा। ड्रॉप आउट कम करने में भी मदद मिली।
1995 में झज्जर जिले के गांव से शुरू हुई केंद्र सरकार की इस योजना में
हालांकि बार-बार व्यवधान आए, नीतिगत अस्पष्टता के कारण कहीं-कहीं आलोचना का
शिकार भी होना पड़ा, व्यवस्थागत पूर्णता का स्तर भी अब तक हासिल नहीं हो
पाया, इसके बावजूद इसकी निरंतरता कायम रखने की केंद्र व राज्य सरकार की
कोशिशें सराहनीय हैं। नए प्रावधान में दोपहर भोजन योजना में चावल की मात्रा
बढ़ा कर गेहूं की घटा दी गई। हाथ धोने के लिए साबुन उपलब्ध करवाने और
पुराने बर्तनों को बदलने की व्यवस्था की गई है। सरकार भले ही लाख दावे करे
पर यह कड़वा सच है कि बड़ी संख्या में स्कूलों में बच्चों को भोजन करने के
लिए
घर से बर्तन लाने पड़ते हैं। घोषणा हुई थी कि दोपहर का भोजन अब एलपीजी से बनेगा पर 95 फीसद से अधिक स्कूल अब भी लकड़ी, उपले आदि पर ही निर्भर हैं। दायित्व निर्धारण में अब तक प्रयोग ही चल रहे हैं। भोजन के लिए अनाज व अन्य सामग्री कहां से खरीदी जाए, कौन खरीद के लिए अधिकृत है, इसे कहां रखा जाए, बर्तन कौन साफ करे, भोजन की गुणवत्ता की नियमित जांच कौन करे, कमी पाए जाने पर दंडित किसे किया जाए, खाद्य सामग्री की पूर्व जांच होती है या नहीं, अध्यापक, मुख्याध्यापक से लेकर खंड, तहसील, उपमंडल तथा जिला शिक्षा अधिकारी की सक्रियता का मापदंड क्या हो? ऐसे कई मुद्दों पर नीतिगत स्पष्टता एवं दायित्व निर्धारण में अधिक विलंब नहीं किया जाना चाहिए। बाजरा, सरसों का साग व अन्य हरी सब्जियां, मसलन बथुआ, पालक, मेथी, चौलाई आदि को भी मिड डे मील में शामिल किया जाए तो पौष्टिकता व गुणवत्ता में निश्चित तौर पर वृद्धि होगी। किसी योजना की प्रभावशीलता उसकी निरंतरता में निहित होती है। निरंतरता के साथ सतत निगरानी भी जोड़ दी जाए तो कई समस्याओं का त्वरित समाधान हो सकता है। बाल, कन्या एवं महिला कल्याण योजनाओं के लिए हरियाणा की साख पूरे देश में है। मिड डे मील योजना में यदि नीति एवं दायित्व की स्पष्टता तय हो जाए तो एक बार फिर प्रशंसित हो सकता है हरियाणा।
घर से बर्तन लाने पड़ते हैं। घोषणा हुई थी कि दोपहर का भोजन अब एलपीजी से बनेगा पर 95 फीसद से अधिक स्कूल अब भी लकड़ी, उपले आदि पर ही निर्भर हैं। दायित्व निर्धारण में अब तक प्रयोग ही चल रहे हैं। भोजन के लिए अनाज व अन्य सामग्री कहां से खरीदी जाए, कौन खरीद के लिए अधिकृत है, इसे कहां रखा जाए, बर्तन कौन साफ करे, भोजन की गुणवत्ता की नियमित जांच कौन करे, कमी पाए जाने पर दंडित किसे किया जाए, खाद्य सामग्री की पूर्व जांच होती है या नहीं, अध्यापक, मुख्याध्यापक से लेकर खंड, तहसील, उपमंडल तथा जिला शिक्षा अधिकारी की सक्रियता का मापदंड क्या हो? ऐसे कई मुद्दों पर नीतिगत स्पष्टता एवं दायित्व निर्धारण में अधिक विलंब नहीं किया जाना चाहिए। बाजरा, सरसों का साग व अन्य हरी सब्जियां, मसलन बथुआ, पालक, मेथी, चौलाई आदि को भी मिड डे मील में शामिल किया जाए तो पौष्टिकता व गुणवत्ता में निश्चित तौर पर वृद्धि होगी। किसी योजना की प्रभावशीलता उसकी निरंतरता में निहित होती है। निरंतरता के साथ सतत निगरानी भी जोड़ दी जाए तो कई समस्याओं का त्वरित समाधान हो सकता है। बाल, कन्या एवं महिला कल्याण योजनाओं के लिए हरियाणा की साख पूरे देश में है। मिड डे मील योजना में यदि नीति एवं दायित्व की स्पष्टता तय हो जाए तो एक बार फिर प्रशंसित हो सकता है हरियाणा।


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ANIL KUMAR
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