शिक्षा का अधिकार प्राधिकरण गठित करने का राज्य सरकार का फैसला सही दिशा
में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। इससे साबित होता है कि सभी को शिक्षा
उपलब्ध कराने के लिए सरकार कितनी प्रतिबद्ध और संकल्पित है। शिक्षा का
अधिकार कानून लागू करने में जिस तरह की दिक्कतें पेश आ रही थीं उससे जरूरी
हो गया था कि कोई व्यवस्थागत कदम उठाया जाए। सबसे आवश्यक था कि ऐसी अधिकार
प्राप्त व्यवस्था बनाना जो पूरी प्रक्रिया पर निगरानी रखे और सुनिश्चित
करे कि इस दिशा में किए गए प्रयास अंजाम तक पहुंचें। राज्य में शिक्षा का
अधिकार कानून अप्रैल 2013 तक पूरी तरह लागू किया जाना है। इस दिशा में अभी
तक किए गए प्रयास और उसके नतीजे संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। खास तौर पर
आवश्यक आधारभूत ढांचा नाकाफी साबित हो रहा है। सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों
के रिक्त पदों को भरने की है। सरकारी स्कूलों की स्थिति किसी से छिपी नहीं
है। कहीं भवन नहीं है तो कहीं विद्यार्थियों को बैठने के लिए कुर्सी मेज
का संकट। मिड डे मील और दूसरे उपाय बच्चों को सरकारी स्कूलों तक लाने में
बहुत असरकारक नहीं हैं। ऐसे में निजी स्कूलों की मदद अवश्यंभावी हो जाती
है। दुर्भाग्य से इस मोर्चे पर समस्याएं और भी ज्यादा हैं। जिस तरह कई
जिलों में निजी स्कूल संचालक सड़क पर उतरने लगे हैं, उससे साफ है कि
समस्या का निदान आसान नहीं है।
यह ऐसे में जरूरी हो गया था कि नवगठित प्राधिकरण को अधिकार संपन्न बनाया
जाए। इसलिए मुख्य सचिव को नवगठित प्राधिकरण का पदेन अध्यक्ष बनाना खास
अहमियत रखता है। एक तरह इसकी बागडोर ऐसे व्यक्ति के हाथ में दी गई है जो
दूरगामी निर्णय लेने में तो सक्षम है ही, जरूरत पड़ने पर दोषियों को दंडित
करने का भी अधिकारी है। पदेन सदस्य बनाए गए अधिकारी भी किसी न किसी तरह से
शिक्षा का अधिकार कानून लागू कराने की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं। स्पष्ट
है कि इन लोगों को समस्याओं और उनके उचित समाधान का भी ज्ञान है। राज्य और
जिला स्तर पर शिकायत निवारण प्रकोष्ठ के गठन से उन लोगों को मदद मिलेगी जो
किसी कारण वश इस अधिकार से वंचित रह जा रहे हों। इस कवायद में ध्यान रखना
होगा कि तकनीकी जटिलताएं हावी न होने पाएं और समस्या के निदान पर जोर रहे।


No comments:
Post a Comment
DEAR USERS YOUR COMMENTS MUST BE VALUABLE.OTHERWISE THEY MAY NOT GET PUBLISHED.
THANKS.
ANIL KUMAR
BLOG ADMINISTRATOR