Thursday, January 5, 2012

विलंब का अर्थ:EDITORIAL OF DAINIK JAGRAN DATED 05 JAN 2012

प्रदेश में शिक्षा विस्तार परियोजनाओं में विलंब का सीधा सा अर्थ है कि या तो संसाधनों का आकलन किए बगैर घोषणा कर दी गई या फिर अमल का प्रशासनिक तंत्र कमजोर व उदासीन है। कोई भी परियोजना सत्ता की कथनी-करनी व जवाबदेही का पैमाना मानी जाती है। उसकी साख भी सीधे तौर पर उससे जुड़ी है। योजनाकारों, विभागों, अधिकारियों की कार्यशैली, निपुणता और यथार्थपरक सोच भी उसमें प्रतिबिंबित होती है। शिक्षा जैसे क्षेत्र में यदि एक सत्र का भी विलंब हो जाए तो उसकी भरपाई या क्षतिपूर्ति में कई सत्रों का समय लग जाता है। हरियाणा वह राज्य है जिसकी कई परियोजनाओं, नीतियों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा मिली और कई राज्य उनका अनुसरण भी कर रहे हैं। ऐसे राज्य में यदि योजनाएं वर्षो लंबित पड़ी रहें तो इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। सरकार को तत्काल संज्ञान लेकर कार्यवाही के लिए विशेष पहल करनी चाहिए। सरकार को यह समझना चाहिए कि जितनी परियोजनाएं पूर्ण होंगी, राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश का कद उतना ही ऊंचा होगा। राजीव गांधी एजुकेशन सिटी, 70 कॉलेजों को उत्कृष्टता केंद्र में बदलने, रेवाड़ी में केंद्रीय स्कूल रोहतक के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान व इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, मुरथल आदि योजनाओं में विलंब शिक्षा क्षेत्र को समृद्ध बनाने के अभियान में निश्चित तौर पर अवरोध का काम कर रहा है। कुछ और देर हुई तो योजना का वास्तविक प्रयोजन और संदर्भ अप्रासंगिक हो सकता है। अन्य पक्षों को भी यह कहने का मौका मिल जाएगा कि आधारभूत कार्य किए बिना ही अति उत्साह में घोषणा कर दी गई। असहज, अप्रिय स्थिति न आए, यह सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। भले ही प्रयास करके अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ें पर जवाबदेही की कसौटी पर सरकार को खरा उतरना ही चाहिए। एक अन्य अहम मोर्चे पर स्वयं को सार्थक, सक्षम और समर्थ साबित करने की आवश्यकता है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 फीसद सीटों पर गरीब बच्चों को दाखिला सुनिश्चित करने की दिशा में आरंभिक स्तर पर भी काम नहीं हो पाया है। न विशेष प्रकोष्ठ गठित हुआ, न निरीक्षण दल और न ही स्कूलों की सीटों के बारे में सर्वेक्षण। प्रदेश में साक्षरता दर में वृद्धि हुई और विकास के मोर्चे पर भी तरक्की की, पर अब भी साधनविहीन एक बड़े तबके को सरकार की मदद की जरूरत है ताकि शिक्षित होकर रोजगार पाने का सपना पूरा हो सके।

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